ज्योति डोभाल संपादक
टिहरी : 08 अगस्त 2026 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की हल्द्वानी जन सभा के बाद 10 अगस्त को सभा स्थल का शुद्धिकरण किया जाना और भाजपा नेताओं का इसे जायज ठहराना संविधान की आत्मा को ठेस पहुंचाना है।
कांग्रेस कार्यकर्ता शान्ति प्रसाद भट्ट ने बताया कि उन्होंने 14 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति को एक शिकायती पत्र जिलाधिकारी टिहरी गढ़वाल के माध्यम से प्रेषित किया था, किंतु आज 16दिन बीत जाने तथा घटना को 20 दिन बीत जाने के बाद भी उत्तराखंड सरकार स्थानीय प्रशासन ने कोई कार्यवाही नहीं करी है।
आखिर शुद्धिकरण की जरूरत क्यों पड़ी ?
उन्होंने कहा कि यदि 8 अगस्त को वहां लोकतांत्रिक राजनीतिक सभा हुई थी, तो दो दिन बाद उसी स्थान का शुद्धिकरण कराने का संदेश समाज को क्या देता है?
राजनीतिक मतभेद अपनी जगह, सामाजिक सम्मान अपनी जगह।
किसी राजनीतिक दल या नेता की विचारधारा से असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन उसके कार्यक्रम के बाद स्थान को “अशुद्ध” मानना सामाजिक दृष्टि से गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
क्या किसी व्यक्ति के आने से सार्वजनिक स्थान अशुद्ध हो जाता है?
यह सवाल केवल कांग्रेस या मल्लिकार्जुन खड़गे का नहीं है,यह हमारे संविधान में निहित समानता, गरिमा और भाईचारे की भावना से जुड़ा सवाल है।
आस्था का सम्मान होना चाहिए, लेकिन सार्वजनिक जीवन में ऐसी गतिविधियों से पैदा होने वाले सामाजिक संदेश पर सवाल पूछना भी जरूरी है?
मल्लिकार्जुन खड़गे देश के प्रमुख अनु जाति के नेताओं में से एक हैं। इसलिए उनके कार्यक्रम के बाद “शुद्धिकरण” जैसी कार्रवाई को लोग सामाजिक बराबरी और छुआछूत की मानसिकता से जोड़कर देख सकते हैं।
शुद्धिकरण किसने कराया?
किस उद्देश्य से कराया?
प्रशासन की इसमें क्या भूमिका थी?
संविधान का मूल संदेश क्या है?
भारत का संविधान व्यक्ति की गरिमा, समानता और सामाजिक न्याय की बात करता है। इसलिए ऐसी घटना पर चर्चा केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
आखिर लोकतांत्रिक सभा के बाद सभा स्थल को शुद्ध करने की जरूरत पड़ती है?
ऐसी घटनाएं सामाजिक समरसता को कमजोरकरती हैं ।
“राजनीतिक विरोध लोकतंत्र की खूबसूरती है, लेकिन किसी राजनीतिक नेता की सभा के बाद सभा स्थल का शुद्धिकरण किया जाना कतई उचित नहीं है।


