प्राकृतिक सम्पदाओं से समृध्द पहचान तलाशता उत्तराखण्ड- अपनी ही भूमि को बचाने के लिए संघर्ष करता उत्तराखण्ड

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लेख : डॉ हरिनारायण जोशी अनजान 

उत्तराखंड : कर क्या रही हैं आखिर 21 वर्षाें से चुनी हुई सरकारें। कांग्रेस, बीजेपी, बसपा, यूकेडी सभी ताे सत्ता का सुख भाेग चुके हैं। और अब तो नए-नए लोग भी सत्ता के लिए सौदागिरी में दांव लगा रहे हैं। लेकिन सब ने अब तक क्या नई पहिचान दी  उत्तराखण्ड काे? जाे कुछ पहले से था उसकाे भी अभी तक विशिष्टता में खड़ा नहीं कर पाये। 

       भरत का जन्म गढ़वाल में हुआ, गंगा-जमुना उत्तराखण्ड हिमालय की बेटियां हैं। विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक ग्रन्थ महाभारत वेदव्यास जी द्वारा गणेश भगवान जी से यहीं लिखाया गया। विश्व विख्यात धार्मिक/आध्यात्मिक धाम यहां हैं। विक्टाेरिया क्रास से यहां के सैनिक सम्मानित हुए हैं। औसत में सबसे अधिक सैनिक उत्तराखण्ड के परिवाराें से भर्ती हाेते हैं। आजाद हिन्द फाैज में भी सबसे अधिक यहां के सैनिक थे। लेकिन 21 वर्षाें ने क्या नई पहिचान दी? राज्य की अपनी स्थाई राजधानी नही। छोटा राज्य और 2 राजधानियों की राजनीति। वह भी चुनावी मुद्दा भर है। खाद्यानाें/भाेजन की काेई विशिष्ट पहिचान नहीं। वही मैगी, चाऊमिन और डाेसा आदि। धार्मिक स्थानाें में जाओ ताे मारवाड़ी,  गुजराती के ताे भाेजनालय हैं लेकिन उत्तराखण्डी कहीं नहीं। काेई बढ़ावा भी नहीं। धार्मिक स्थलाें पर यहां की संस्कृति गूुंजायमान नहीं।  पर्यटन स्थल जैसी सुविधाएं उपलब्ध और उत्तराखण्डी सांस्कृतिक परिवेष गायब। आश्चर्य कि अपने ही राज्य में अपनी ही भूमि को बचाने के लिए आंदोलन करने पड़ रहे हैं। लगभग 54000 वर्ग किलोमीटर का राज्य और वह भी पर्वतीय राज्य। यदि इस राज्य में भूमि ही नहीं बचेगी तो राज्य का अपना अस्तित्व ही क्या रह जायेगा। उसके पशुधन का क्या होगा। उसकी खेती का क्या होगा। उसके पर्यावरण का क्या होगा। उसके जंगल और नदी स्रोतों का क्या हहोगा और फिर उसके जीवन का ही क्या होगा। 

सब कुछ वाेट बैंक ही नहीं हाेता है। और आय बढ़ाने के लिए शराब से प्राप्त राजस्व ही नहीं होता। अपनी मूल पहिचान और स्वाभिमान के बिना व्यक्ति हाे चाहे प्रदेश, सांस्कृतिक खाेखलापन है। पहले अपनी हर क्षेत्र में एक सशक्त पहिचान दाे। आज दो अभी दो उत्तराखंड राज्य दो, का सपना साकार कर दो।

 

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