सीमांत जिले पिथौरागढ़ का है आपदा से पुराना नाता, चमोली के रैणी गांव में आई आपदा ने किए जख्म हरे
रिपोर्ट.... नदीम परवेज
पिथौरागढ़... भूकंप की दृष्टि से जोन-फाइव में आने वाला पिथौरागढ़ जिले का आपदा से पुराना नाता है। सीमांत जिले में लगभग हर वर्ष मानसून पत्र में आपदा आती है। हर वर्ष बढ़ रही आपदा की घटनाओं के पीछे पहाड़ों में चल रहे भूगर्भीय हलचल व निर्माण कार्य हैं। अधिकतर आपदाएं मानवजनित आपदाएं हैं। विकास की दौड़ में पर्यावरण की अनदेखी लोगों पर भारी पड़ रही है। सड़कों के निर्माण के लिए हजारों पेड़ों की बलि दी जा रही है। पहाड़ियों को काटने के लिए विस्फोटकों का प्रयोग किया जा रहा है। सड़क निर्माण के मलबे को गाड़-गधेरों और नदियों में डाल दिया गया है। इससे नदियां रास्ता बदल रही हैं और भू-कटाव आदि की घटनाओं में इजाफा हुआ है। आपदा के आंकड़ों के अनुसार पिथौरागढ़ जिले में 90 के दशक से आपदाओं में काफी बढ़ोतरी हुई है। ला-झेकला, मालपा, बस्तड़ी, मदरमा, मांगती जैसी बड़ी आपदाओं की घटनाओं से भी आज तक कोई सबक नहीं लिया गया है।
अब तक लगभग 400 लोग गंवा चुके हैं जान
पिथौरागढ़ सीमांत जिले में वर्ष 1994 से अब तक 400 से अधिक लोग जान गंवा चुके हैं। 1994 में रीठा रतौली में आई आपदा में 19 लोगों की मौत और 1998 में मालपा आपदा में कैलाश मानसरोवर यात्रियों सहित 221 लोगों ने अपनी जान गंवाई थीं। वर्ष 2007 में स्याकुंरी, बरम में आई आपदा में 43 की मौत हुई थी। 2009 ला-झेकला में भी इतने ही लोगों की जान चली गई थी। 2010 धारचूला-मुनस्यारी मेें आई आपदा में 10 लोगों को जान गंवानी पड़ी थी। 2013 में धारचूला-मुनस्यारी में आई आपदा में 23 लोगों की मौत हुई थी। इसमें 21 लोग लापता और 42 लोग घायल हो गए थे। 2014 धारचूला- मुनस्यारी में आई आपदा में 12 लोगों की मौत दो लोग लापता और 17 लोग घायल हो गए थे। 2016 में बस्तड़ी और फिर 2020 में मुनस्यारी के टांगा गांव की आपदा को पहाड़ के लोग कभी नहीं भूल सकेंगे। पर्यावरणविदों का मानना है कि इन आपदाओं के लिए मानव ही जिम्मेदार है। हमेशा शांत रहने वाले हिमालय को विकास की कीमत चुकानी पड़ रही है।
विस्फोटक, भारी मशीनों से हिलाए जा रहे पहाड़
पिथौरागढ़ जिले के जोन फाइव में आने के बावजूद निर्माण कार्यों में विस्फोटकों का प्रयोग किया जा रहा है। सीमांत जिले की धरती कभी भूकंप तो कभी विस्फोटकों से हिलती रहती है। ऐसे में भविष्य में यदि बड़ा भूकंप आया तो पहले से ही कमजोर पड़े मकानों और पहाड़ियों से बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। मोटर मार्ग में चट्टानों को काटने के लिए भारी मात्रा में विस्फोटक और भारी भरकम मशीनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे पहाड़ हिल गए हैं। लगातार जमीन के हिलने से पानी के स्रोत समाप्त हो रहे हैं। पहाड़ियों में दरारें पड़ने से पहाड़ियां कमजोर पड़ रही हैं और आपदा आने का खतरा बढ़ गया है। इसका ग्रामीण कई बार विरोध भी कर चुके हैं, लेकिन विस्फोटक का इस्तेमाल जारी
छह सालों में 160 करोड़ का नुकसान:-जनपद पिथौरागढ़ में पिछले छह सालों में आई आपदा में करीब 160 करोड़ से अधिक निजी और सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान हुआ है। इन आपदाओं में करीब 950 से अधिक परिवारों के घर ध्वस्त हुए हैं। सीमांत जिले के चीन सीमा से लगे धारचूला और मुनस्यारी विकासखंड के 24 गांवों की 300 से अधि
क लोगों पर बरसात में आपदा आने का संकट गहरा जाता है। बावजूद इसके इनके विस्थापन को लेकर ठोस रणनीति नहीं बन पाई है।
श्रोत आपदा आंकड़े पिथौरागढ़
प्रदीप कुमार सहायक भू वैज्ञानिक ने बताया कि हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ रही आपदाओं के पीछे का मुख्य कारण अनियोजित विकास भी एक पहलू है। पहाड़ विकास की कीमत चुका रहे हैं। सड़क निर्माण का मलबा नदियों में डालने से नदियां रास्ता बदल रही हैं। पहाड़ियों के काटने के लिए भारी भरकम मशीनों और विस्फोटकों का प्रयोग होने से पहाड़िया कमजोर हो रही है, जिससे भूकम्प आने से खतरा अधिक बढ़ जाता है। विस्फोटकों के प्रयोग से भूमिगत जल अपना रास्ता बदल रहे है जिससे पहाड़ के गांव में पानी की कमी भी देखी गयी है। मोटर मार्ग के एक ही पहाड़ी पर कई संरेखण दिये जाने से जंहा पहाड़ी कमजोर हो रही है वंही गांव व बस्ती को खतरा हो रहा है। इस कारण भूकंप और भूस्खलन, ग्लेशियरों के खिसकने की घटनाएं बढ़ रही हैं। विस्फोटकों का प्रयोग पूरी तरह से बंद होना चाहिए तथा उच्च हिमालयी क्षेत्रो में मोटर मार्ग कटिंग से इतर अन्य विकल्प पर भी विचार किया जाना चाहिए।


