ईर्ष्या विष से भी अधिक घातक है: आचार्य ममगाईं

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ज्योति डोभाल संपादक 



नई टिहरी। भिलंगना ब्लॉक के लैणी गांव (भिलंग) स्थित नागराज प्रांगण में धियाणियों की ओर से आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के तीसरे दिन कथावाचक आचार्य शिवप्रसाद ममगाईं ने ध्रुव चरित्र का वर्णन करते हुए ईर्ष्या से बचने और अच्छे संस्कार अपनाने का संदेश दिया।

आचार्य ममगाईं ने कहा कि ईर्ष्या विष से भी अधिक घातक होती है। ध्रुव और राजा उत्तानपाद के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ईर्ष्या के कारण ही सुरूचि ने ध्रुव को राजा की गोद में बैठने से रोका, लेकिन भगवान की कृपा से ध्रुव को अखंड यश और दीर्घकाल तक राज्य करने का आशीर्वाद मिला। उन्होंने कहा कि ईर्ष्या का अंत सदैव विनाश में होता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य की पहचान उसके शब्दों और संस्कारों से होती है। अच्छे शब्द, विनम्र व्यवहार और कर्तव्यनिष्ठ कर्म श्रेष्ठ संस्कारों के प्रतीक हैं। शब्द ऐसे होने चाहिए, जो दूसरों के मन को आहत न करें। उन्होंने कहा कि कई बार शब्दों के घाव जीवनभर नहीं भरते, इसलिए हमेशा मर्यादित और मधुर वाणी का प्रयोग करना चाहिए। यदि कटु शब्द बोलने की स्थिति हो तो मौन रहना अधिक उचित है।

कथा के दौरान ध्रुव प्रसंग और अन्य प्रसंगों का वर्णन सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो गए। इस अवसर पर डॉ. रामकृष्ण भट्ट, अध्यक्ष सरस्वती भट्ट, सचिव संगीता नौटियाल, आचार्य द्वारिका पैन्यूली, डॉ. आचार्य जगदंबा प्रसाद पैन्यूली, सूर्यमणि पैन्यूली, सुंदर लाल उनियाल, देवीप्रसाद पैन्यूली सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।

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