ज्योति डोभाल संपादक
टिहरी गढ़वाल। समाज में व्याप्त नशाखोरी के खिलाफ वर्ष 2014 में टिहरी जनपद से सामाजिक कार्यकर्ता सुशील बहुगुणा द्वारा शुरू की गई “शराब नहीं संस्कार मुहिम” अब उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में सामाजिक परिवर्तन का आधार बनती जा रही है। इस मुहिम का प्रत्यक्ष प्रभाव यह है कि आज राज्य के कई गांवों में शादी-विवाह और मांगलिक कार्यक्रमों में शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जा चुका है।
ग्राम सभाओं और सामाजिक संगठनों द्वारा लिए जा रहे इन फैसलों में शराब परोसने वालों पर जुर्माना और सामाजिक दंड का प्रावधान किया गया है। जौनसार-बावर क्षेत्र के लगभग 25 गांवों, उत्तरकाशी, चकराता, देहरादून और गढ़वाल अंचल के कई गांवों में यह नियम प्रभावी हो चुका है। कई स्थानों पर ग्राम सभाओं ने स्पष्ट किया है कि जो परिवार इस नियम का उल्लंघन करेगा, उस पर 20 हजार से लेकर एक लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा।
सुशील बहुगुणा का कहना है कि “शादी जैसे पवित्र संस्कारों को नशे से जोड़ना हमारी सामाजिक जड़ों को कमजोर करता है। यह मुहिम किसी कानून के बल पर नहीं, बल्कि सामाजिक सहमति और नैतिक जागरूकता से आगे बढ़ रही है।”
महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों की भागीदारी से यह आंदोलन गांव-गांव तक पहुंच रहा है। कई ग्राम पंचायतों ने यह भी तय किया है कि शराब पर खर्च होने वाला धन शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक विकास में लगाया जाएगा।
सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि “शराब नहीं संस्कार मुहिम” केवल नशा विरोधी अभियान नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार, आर्थिक सादगी और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आंदोलन बन चुका है। यदि यही क्रम जारी रहा, तो आने वाले समय में उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बन सकता है, जहां गांव स्तर पर सामाजिक आयोजनों में शराब का चलन स्वतः समाप्त हो जाएगा।


