संघी अंग्रेजों के दौर में वंदेमातरम् की छाया तक से भागते थे: राकेश राणा

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ज्योति डोभाल संपादक 


 टिहरी : वन्देमातरम के 150वें वर्ष पर RSS और भाजपा छाती पीट रही है। नीचे से लेकर ऊपर तक संघी गैंग चिल्ला रहा है कि पंडित नेहरू ने वंदेमातरम् के कुछ पैराग्राफ काट दिए।


लेकिन असली सवाल यह है कि RSS का वन्देमातरम से क्या संबंध है? कांग्रेस के कार्यक्रमों में तो शुरू से ही जन गण मन और वंदेमातरम गाया जा रहा है। अगर RSS को वंदेमातरम् से नफ़रत नहीं होती तो फिर RSS वाले वंदेमातरम् से मिलता जुलता नमस्ते सदा वत्सले गीत अपनी प्रार्थना के लिए क्यों गढ़ते।


वंदेमातरम् और नमस्ते सदा वत्सले दोनों ही भारत माता की वंदना है। RSS चाहता तो 1925 में अपनी स्थापना के साथ ही वंदेमातरम् को अपनी प्रार्थना बना लेता, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।


इसकी वजह यह है कि वंदेमातरम् भारत की आज़ादी के सेनानियों और कांग्रेस पार्टी की आज़ादी की लड़ाई का जयघोष था। वंदेमातरम् कहने वालों को जेल जाना पड़ता था और अंग्रेजों की लाठियां खानी पड़ती थी।


इन लाठियों से डरकर RSS ने वंदेमातरम् की तरह मुँह उठाकर नहीं देखा और अलग से नमस्ते सदा वत्सले को अपनी प्रार्थना बनाया।


अब आती है बात कुछ पैराग्राफ काटने की। तो इन बेशर्मों को यह याद नहीं आ रहा कि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का आकार छोटा ही होता है। यह कोई जवाबी क़व्वाली का मुक़ाबला नहीं है जहाँ घंटों तक गीत गाया जाए। राष्ट्रगान के रूप में जन गण मन का भी छोटा सा हिस्सा लिया गया है और राष्ट्रगीत के रूप में वंदेमातरम् का भी एक ऐसा ही दिया गया है।


नेहरू जी ने जब जन गण मन को राष्ट्रगान घोषित किया तो उसके दो कारण बताए। पहला तो यह कि सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज के लिए पहले ही जन गण मन को राष्ट्रगान बना दिया था और इसकी धुन भी तैयार कर दी थी।


पंडित नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस वाला वर्जन ही राष्ट्रगान और राष्ट्र धुनके रूप में स्वीकार किया।


दूसरी वजह यह थी कि राष्ट्रगान की धुन ऐसी होनी चाहिए जो देश की जय, पराक्रम और उत्साह को व्यक्त करे। पंडित नेहरू ने कहा था कि वंदेमातरम् हमारे संघर्ष की पहचान है लेकिन जन गण मन भारत की जनता की विजय और भविष्य के उत्साह की पहचान है। जय जय जय जय हे। 


भारत माता के इसी पराक्रम उत्साह और जयकारे के कारण पंडित नेहरू ने और भारत की संविधान सभा ने जन गण मन को राष्ट्रगान बनाया और भारत की स्वतंत्रता के लंबे संघर्ष की यादगार के तौर पर वंदेमातरम् को राष्ट्रगीत बनाया।


वे संघी जो अंग्रेजों के दौर में वंदेमातरम् की छाया तक से भागते थे। आज उन्हें इस पर सवाल उठाने का कोई अधिकार नहीं है।

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