परमवीरों की यही नियति है

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 परमवीरों की यही नियति है ! 


उठो अजय! तुम आंखें खोलो !

देखो! कौन तुम्हें जगाने आए हैं !

भारत माता के हर कोने-कोने से,

तुम्हारा पराक्रम  देखने आए हैं ! 


उठो अजय ! एक बार तुम !

देखो! अपनी जननी जन्मभूमि को!

तुम्हें जगाने त्रिहरी भारत से

जन आज द्वार तुम्हारे आये हैं। 


ऐ शौर्य के अग्रदूत अजय रौतेला !

तुम एक बार तो आंखें खोलो !

तड़फ रही है तुम्हारी कुजंणी खाड्डी,

रूठो मत मित्र ! कुछ तो बोलो ! 


उठो पराक्रम के परम पुरुष तुम!

क्यों इस चिर निंद्रा में लेटे हो ? 

शौर्य वीर पराक्रमी साथी सैनिक,

सभी तुम्हें जगाने  को आए हैं ! 


उठो परमवीर अजय  तुम !

देखो हेंवल क्षेत्र सरिता कानन!

आज तुम्हारा रामपुर बन गया,

भारत माता का पावन आंचल। 


उठो मित्र! तुम आंखें खोलो'

देखो! बाल  बृद्ध जन आए हैं !

माताएं बहने बेटियां बांधव,

सब तुम्हें मनाने यहाँ आए हैं ! 


बिलख रही है आज वसुंधरा !

जय -घोष अमरता नारों से।

लाज रखी तुमने मां दूध की,

इस महा वीरगति के पाने से !


ऐ विजयी वीर अजय रौतेला !

तुमने भारत माता का मान बढाया।

वीर हमारे अजय - अमर तुम ,

सर्वोच्च शौर्य बलिदान तुम्हें है भाया। 


इतिहास अमरअमिट वीरों का,

नाम इसी का वीरगति है।

ऐ सिंह सपूत मातृभूमि के !

परमवीरों की यही नियति है। 


कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत।

    ( कवि कुटीर)

सुमन कॉलोनी चंबा, टिहरी गढ़वाल।

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