रिपोर्ट : ज्योति डोभाल
टिहरी : वनाधिकार आंदोलन के प्रणेता किशोर उपाध्याय" की मुहिम में पहले दिन से सक्रिय रहे,अधिवक्ता शान्ति प्रसाद भट्ट ने एक प्रेस बयान जारी करते हुए कहा कि"हमे किशोरउपाध्याय का आभार व्यक्त करना चाहिये।
चूँकि उतराखण्ड में उन्होंने सबसे पहले अपने सहयोगी साथियों के साथ मिलकर तिलाड़ी की महान थाती से "वनाधिकार आंदोलन" की अलख जाएगी, और उतराखण्ड के जंगलों के एवज में सरकारों से निःशुल्क बिजली पानी और एलपीजी गैस की माँग की थी.
इसी क्रम में उतराखण्ड के ऊर्जा मंत्री डॉ हरक सिंह रावत ने 100 यूनिट निःशुल्क बिजली देने का बयान जारी किया, तो पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने उन्हें100 नही 200यूनिट निःशुक्ल बिजली देनेकी सलाह दी और यह भी कहा कि भविष्य में कांग्रेस की सरकार इसे पूरा करेगी.
ज्ञात हो कि किशोर उपाध्याय और उनके सहयोगी साथी सम्पूर्ण उतराखण्ड में "वनाधिकार आंदोलन" के बैनर तले उतराखण्ड के वनों की एवज में सरकारों से यहाँ के लोगो को गिरिजन ओर अरण्यजन का दर्जा देने सहित निम्नांकित माँगे सरकार से करते आ रहे है,इसके लिए राज्य से लेकर केंद्रीय सरकार तक को कई बार निम्नांकित माँगो का ज्ञापन दे चुके है
प्रत्येक परिवार को प्रतिमाह निःशुल्क बिजली, पानी और एक एल पी जी गैस सिलेंडर दिया जाय।
प्रत्येक परिवार के एक सदस्य को पक्की सरकारी नोकरी दी जाय, ओर केंद्र की सेवाओं में आरक्षण हो तथा शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाएं निःशुक्ल हो।
एक परिवार को घर बनना हेतु बजरी/लकड़ी निःशुल्क हो ।
जंगली जानवरों के हमले में मानव छति पर 25लाख छति पूर्ति राशि और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नोकरी, जंगली जानवरों से फसल नुकसान पर प्रति नाली5पाँच हजार छति पूर्ति दी जाय।
जड़ी बूटियों पर स्थानीय समुदाय के अधिकार हो।
अपने काश्त की भूमि पर उगे पेड़ चीड़ पर भूस्वामी का अधिकार हो वह उसे जब चाहें काट छांट सकें।
राज्य में अविलंब चकबन्दी लागू हो और भू कानून बनाया जाय।
उपरोक्त माँगो के पीछे उतराखण्ड के ये आंकड़े है आधारभूत :- उतराखण्ड में
72%भाग वनों से आच्छादित, 18%भाग हिमाच्छादित, 12हजार से अधिक ग्लेशियर, 8बड़ी नदियां, ओर अनेक सहायक नदियां जो समस्त उतर भारत की जीवन रेखा है, ओर6करोड़ से अधिक लोगो को जीवन देती है।
मात्रा 6%कृषि भूमि है।
उतराखण्ड जहाँ सम्पूर्ण उत्तरभारत को शुद्ध आक्सीजन, पेयजल ओर सिंचाई जल सहित विधुत, की आपूर्ति कर रहा हो ,ऐसे में केंद्रीय सरकार सहित राज्य सरकारों को भी उतराखण्ड में "वनाधिकार आंदोलन"की मांगों को सहर्ष स्वीकार कर लेना चाहिए।
अब वक्त है वनों पर आधारित अनगिनत कानूनों की समीक्षा का चूँकि अभी तक वन ओर उनसे सम्बंधित जो कानून है उनमें:-
भारतीय वन अधिनियम1972, वन संरक्षण अधि.1980, वन्य जीव संरक्षणअधि.1972, पशु अतिचार अधि.1971, उप्र वृक्ष सरंक्षण अधि.1976
अनुसूचित जाति ओर अन्य परम्परागत वन निवासी(वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम2006
राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम 2010
जनता जागे, सरकार हिले:-
टिहरी उतरकाशी के महापुरूषो ने कालांतर में भी वनाधिकारों के लिए संघर्ष किया था,1930 का "तिलाड़ी कांड" कोई नही भूल सकता जब ग्रामीण राजशाही के खिलाफ वनाधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए अनेको लोग शहीद हो गए थे, टिहरी के "खास पट्टी" का "वनाधिकार ढंडक" भी भूला नही जा सकता है, जिसमे अपने हक हकूकों के लिए जनता ने संघर्ष किया था ,ओर राजा ने उन्हें काला पानी की सजा दी थी, हमने केवल जंगलों पर अपने अधिकार ही नही मांगे अपितु जंगलों को पाल पोश कर खड़ा भी किया है, हमारे दिवंगत महापुरुष जिनमे विशेश्वर दत्त सकलानी जी ने सकलाना रेंज में रिकार्ड वृक्ष लगाए थे,वहीँ विश्व प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुंदर लाल बहुगुणा जी की अलख को भुलाया नही जा सकता हम उतराखण्ड के लोग गौरा देवी और चंडी प्रसाद की थाती के लोग है, जिन्होंने वृक्ष संरक्षण के लिए अदम्य साहस का परिचय दिया है, हमारे जंगलों से ही हमे अन्न सुरक्षा, जल सुरक्षा, वायु सुरक्षा प्रदान होती है, हमारे जीवन के केंद्र में जंगल है जो हमे भोजन, चारा,गीत संगीत, खेती पशुपालन आदि प्रदान करते है।
देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने भी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था कि एक वृक्ष 75000रुपये की पर्यावरणीय सेवाएं देता है, इसी से अंदाज लगाया जा सकता है,कि उत्तराखंड में कितने वृक्ष है, और वे कुल कितनी पर्यावरणीय सेवाएं देते है, उसी अनुपात में वनाधिकार आंदोलन की मांगों को भी माना जाय।
कहा कि अब कालांतर की लठ पंचायतो से सबक लेते हुए, हमारी सरकारों को वनपचायतो को मजबूत करते हुए वनों पर नागरिकों के हक हकूक प्रदान करने होंगे,ओर इसी तरह से नागरिक सुविधाए बहाल करनी होंगी।


