एक था रिखणीखाल का डबराड़

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Team uklive

 पौड़ी : 11 वर्ष पूर्व डबराड़ गाँव के लिए माननीय मुख्यमन्त्री मेजर जनरल (से.नि.) भुवनचंद खंडूरी जी द्वारा  सड़क स्वीकृत हुई थी। यह कार्य महिला मंगल दल ग्राम सभा डबराड़ के मांग पत्र और संजय सिंह रावत अध्यक्ष ड्रीम हिल्स यूथ वैल्फेयर एसोसिएशन के सौजन्य से हुआ था। परन्तु सडक के वित्तीय स्वीकृती के दस्तावेजों में सामान्य तौर पर स्वीकृत सडक को अनुसूचित जाति के नाम पर डायवर्ट कर दिया गया और यह काम मुख्य रूप से करने और करवाने वाले थे, लाल सिंह रावत जो कि डबराड के ही निवासी हैं और वर्तमान में लोक निर्माण विभाग लैन्सीडाउन में अधिकारी हैं और इस कार्य में फर्जी दस्तावेज बनाने और विभाग में लगवने में इनका साथ देने वाले थे कुलवंत सिंह रावत जो कि इन्ही के चचेरे भाई हैं और तत्कालीन प्रधान रमेश चन्द -जो कि दिनांक 01/03/1998 को मु0आ0सं0 2/96 सरकार जरिये वादी जसोदा देवी पत्नी लालदास निवासी डबराड  (गाजा) को जुर्म धारा 323/452/436/395/506 ता0हि0 के तहत कुर्की कर ग्राम पंचायत डबराड से निष्कासित किया गया था। इन लोगो की मोटर मार्ग पर गलत कार्यवाही को देखते हुए डबराड तल्ला वासियों ने आपत्ति जाहिर की जिस कारणवश मोटर मार्ग पर वार्ता होने तक निर्माण का कार्य अधूरे में रोक दिया गया। वर्ष 2013 और 2015 में दो बार विभागीय अधिकारियों के साथ  वर्ता होने के बाद ग्रामसभा से पुनः प्रस्ताव दिये गये। परन्तु प्रस्ताव लोक निर्माण विभाग लैन्सीडउन तक पहुंचे ही नहीं।


और नतीजा यह कि संजय सिंह रावत व ग्राम वासी आतिथि हर नेता और प्रधानमंत्री कार्यालय  तक इस मोटर मार्ग की लडाई लडते आ रहे हैं। परन्तु कोई निष्कर्ष नही निकला और आलम ये है कि ग्रामवासियों को डरा धमका कर इन्ही कुछ रसूकदार लाल सिंह रावत, कुलवन्त सिंह रावत और रमेश चन्द ने सड़क को ऐसे तोड़ मरोड़ कर दिया कि अपने  लिए सड़क बनाए दूसरे के लिए ढाकर रोड़ भी नसीब नही। सड़क को मल्ला डबराड़ मे अपने निवास की तरफ मोड़ दिया। सड़क का अभिप्राय खत्म कर दिया गया। सर्वे करने वाले अंधों को ने यह नही सोचा कि सड़क क्यों बनाई जा रही हैं। केवल अपना स्वार्थ देखा।

मांग गाँव की सड़क गाँव की जमीन गाँव की क्षेत्र पंचायत गाँव का दर्द गाँव का आँसू गाँव के बदहाली गाँव की अब झगड़े गाँव के।  डिंड से डबराड़ के मध्य सड़क 1 बारिश नही झेल सकी बरशात सूरु होने से पूर्व सड़क नदी में मिल गई। पूरा 2 km सड़क बह कर 1km दूर सेरोगाड आ गया। अब सवाल यह हैं कि जिम्मेदारी किस की है लोग ग्रामीणों को कह रहे हैं कि जब ठेकेदार सड़क बना रहा था तो आवाज क्यों नही उठाई। पर क्या जनता हर निर्माण कार्य की गुणवत्ता ही जांचती रहेगी यदि ऐसा ही करना हैं तो फिर अभियंता किस लिए हैं क्या आम लोगों को निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पता होती हैं। बहुत लंबी लड़ाई के बाद हाथ सिर्फ मायूसी आई तो क्या लड़ाई लड़ी गई। गाँव पलायन हो चुका हैं। गाँव में शिक्षा चिकित्सा का अभाव हैं।


चिकित्सा केन्द्र और कर्मचारी सिर्फ कागजों में धरातल पर कुछ नही। अध्यापकों के लिए स्कूल जाना टेड़ी खीर बनी हुई हैं। 3 km पर बिखरे गाँव की स्थिति बहुत दयनीय हैं। सड़क का ढांचा तैयार भी नही हुआ कि धराशाही हो गया। कौन जिम्मेदार हैं किस की खामी हैं यह जांच का विषय हैं पर ग्रामीणों को राहत कब मिलेगी कसूरवार को सजा कब मिलेगी यह समय की गर्त में हैं।


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