द गंगा इन द हिमालया फिश डाइवर्सिटी एंड एनवायरनमेंट "का डॉ रमेश पोखरियाल निशंक ने किया विमोचन

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 रिपोर्ट...  यशपाल सिंह सजवाण

 टिहरी.... हे.न.ब. केंद्रीय विवि के स्वामी रामतीर्थ परिसर बादशाहीथौल में कार्यरत प्रोफेसर डॉ एन के अग्रवाल की पुस्तक " द गंगा इन द हिमालया फिश डाइवर्सिटी एंड एनवायरनमेंट "का विमोचन भारत सरकार के शिक्षा मंत्री डॉ रमेश पोखरियाल निशंक ने किया।पुस्तक में विगत वर्षों में मानवीय गतिविधियों व प्राकृतिक आपदाओं से हिमालयी नदियों और जलधाराओं में जलीय जैवविविधता में हुए परिवर्तन, नदियों जल धाराओं के सरक्षण व  यहाँ पायी जाने वाली विभिन्न प्रजातियों की मछलियों के बारे में उल्लेख है। 

 हिमालययी विश्वविद्यालय माजरी देहरादून में आयोजित कार्यक्रम में भारत सरकार के शिक्षा मंत्री डॉ रमेश पोखरियाल निशंक ने हिमालय में गंगा के पर्यावरण एवं उसकी जैवविविधता के संरक्षण के सामयिक विषय पर हेनब केन्द्रीय विवि के प्रोफेसर एन के अग्रवाल द्वारा लिखित  पुस्तक "द गंगा इन द हिमालय: फिश डाइवर्सिटी एंड एनवायरनमेंट"  का विमोचन करते हुए प्रोफेसर एन के अग्रवाल के शोधकार्य को सराहते हुए कहा कि इस पुस्तक में दी गयी जानकारियां पर्यावरण वैज्ञानिकों, शोधार्थीयो और छात्रों के लिए लाभप्रद होगी।पुस्तक के लेखक प्रो एन के अग्रवाल गढ़वाल केंद्रीय विवि के स्वामीरामतीर्थ परिसर बादशाहीथौल में जीवविज्ञान विभाग में प्रोफेसर है।वे विगत 30 वर्षों से गढ़वाल हिमालय की मुख्य नदियों एवं उनकी सहायक जलधाराओं के पर्यावरण व उनकी मत्स्य जैव विविधता पर शोध कार्य कर रहे हैं।

उन्होंने बताया कि कुछ दशकों में गढ़वाल हिमालय में विकास के अवधारणा के साथ मानवीय गतिविधियों का दखल तेजी से बढ़ा है । नदियो - जल सम्पदा का बांधों एवं अन्य विकास परियोजना के द्वारा अनियंत्रित दोहन, प्राकृतिक आपदाओं के कारण  ऊपरी गंगा नदी परितंत्र के पर्यावरण एवं जलीय जैव विविधता पर विपरीत प्रभाव पड़ा है।बताया कि इस पुस्तक में गढ़वाल हिमालय की गंगा एवं इसकी सभी मुख्य सहायक जल धाराओं के पर्यावरण एवं मत्स्य जैव सम्पदा की वर्तमान स्थिति  एवं इसके संरक्षण और संवर्द्धन पर जोर दिया गया है। बांधो के अनियंत्रित निर्माण के कारण नदियो के जल प्रवाह में अवरोध,  निरन्तरता की कमी और नदिय  पर्यावरण का ह्रास हुआ है। जिस कारण मत्स्य सम्पदा को भारी नुकसान हुआ है और जैव विविधता में अत्यधिक कमी आयी है। जंहा 80 के दसक में गढ़वाल की नदियों में 43 मत्स्य प्रजातियां पाई जाती थीं वंहा अब कुल मिला कर 28 प्रजातियां ही शेष बची है।उन्होंने कहा कि नदियों एवं छोटी छोटी जलधाराओं में विभिन्न प्रजातियों की मछलियों के महत्वपूर्ण आवास व जनन क्षेत्र (क्रिटिकल हैबिटैट) होते हैं।इन क्षेत्रों को  चिन्हित कर उनके संरक्षण व मत्स्य वैज्ञानिकों के निर्देशन पर मत्स्य हेचरी के निर्माण और स्थानीय मत्स्य  प्रजातियों के बीजो को नदियों में संचयन की आवश्यकता है।कहा कि मत्स्य सम्पदा के विकास के द्वारा जंहा खाद्य सुरक्षा को  बढ़ावा मिलेगा वही दूसरी ओर उत्तराखंड में मत्स्य आखेट आधारित पर्यटन से स्थानीय युवाओं को रोजगार भी प्राप्त होगा। इस मौके पर हिमालययी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर जे पी पचौरी, उप कुलपति डॉ राजेश नैथानी, सचिव बाल कृष्ण चमोली, प्राचार्य प्रो सी एम डोभाल, डॉ निशांत, डॉ मनीष पाण्डेय डॉ सविता मोहन, प्रो मनोज कुमार, प्रो अनुज शर्मा आदि मौजूद रहे।

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