Team uklive
टिहरी (05 फरवरी ): सोमवार को मूल निवास भू कानून समन्वय समिति के द्वारा जिला मुख्यालय नई टिहरी में जिलाधिकारी के माध्यम से उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को ज्ञापन प्रेषित किया गया.
ज्ञापन के माध्यम से अवगत करवाते हुए कहा कि उत्तराखंड के लोग विशेषकर युवा पिछले लंबे समय से राज्य में अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए आंदोलनरत हैं।
राज्य में संविधान प्रदत्त ‘मूल निवास 1950’ को समाप्त कर उसे ‘स्थायी निवास’ में बदलने और उसकी कट आ ऑफ डेट 1985 करने के विरोध में राज्य में समय-समय पर आवाज उठती रही है। पिछले दिनों राज्य के विभिन्न हिस्सों से आकर युवाओं ने एक बड़े जन सैलाब के रूप में 24 दिसंबर, 2024 को उत्तराखंड राज्य के शिल्पी और पहाड़ के गांधी इंद्रमणि बडोनी की जयन्ती पर देहरादनू में अपनी बात सरकार के सामने रखी।
अब यह आंदोलन राज्य के तमाम हिस्सों में भी जोर पकड़ रहा है। चिंता इस बात की है कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के सामने अपने ‘मलू निवास’ को साबित करने का संकट भी खड़ा हो गया है।
समिति ने मुख्यमंत्री से मांग करते हुए कहा कि इस ज्ञापन के माध्यम से हम उत्तराखंड में मूल निवास पर हुई विसंगतियों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं।
राज्य बनने से पहले उत्तराखंड के सभी लोगों को मूल निवास 1950 के आधार पर प्रमाण-पत्र जारी होते थे।
राज्य बनने के बाद जब पहली अंतरिम सरकार बनी तो इसे ‘मूल निवास’ से हटाकर ‘स्थायी निवास’ कर दिया गया और इसकी कट ऑफ डेट भी 1985 कर दी।
और यहीं से हमारे संवैधानिक अधिकारों पर हमला हुआ। जबकि पूरे देश में यह कट ऑफ डेट संविधान लागू होने के समय यानि 1950 में राष्ट्रपति के प्रेसिडेंशियल नोटिफिकेशन के अनुसार लागू है।
वर्ष 2010 में उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय ने भी इसे प्रेसिडेंशियल नोटिफिकेशन के अनुसार सही माना, लेकिन 2012 में उच्च न्यायालय उत्तराखंड की एकल पीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया कि मौलिक अधिकारों के तहत किसी भी व्यक्ति को देश के किसी भी हिस्से में रहने और वहां के अवसरों का लाभ लेने का अधिकार है। इसी फैसले के आलोक में कोर्ट ने इसकी कट ऑफ डेट भी राज्य बनते समय की वर्ष 2000 कर दी।
उत्तराखंड के लोगो के लिए यह किसी आघात से कम नहीं था। तत्कालीन सरकार इसके खिलाफ न तो डबल बैंच में गई और न उसने उच्चतम न्यायालय में इसे चुनौती दी।
इसका परिणाम यह हुआ कि बड़ी संख्या में राज्य में रहने वाले युवाओं के नौकरी और शिक्षा के अवसर सीमित हो गये।
इस ज्ञापन के माध्यम से हम मांग करते हैं कि उत्तराखंड में राज्य गठन से पहले जिस तरह से ‘मूल निवास 1950’ को मान्यता थी उसे बहाल किया जाय।
मूल निवास की कट ऑफ डेट संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार 1950 हो। ‘
स्थायी निवास प्रमाण-पत्र’ जैसी व्यवस्था को समाप्त किया जाये।
सरकार राज्य में संविधान के मौलिक अधिकारों की धारा 16-ए के अनुसार राज्य विधानसभा में एक संकल्प पारित करे, जिसमें तृतीय और चतुर्थ श्रेणी सहित उन सभी पदों पर स्थानीय युवाओं के लिए पद आरक्षित करे। इस तरह की व्यवस्था देश के चार राज्यों आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा, हिमाचल और मणिपुर में है। यह अधिकार हमें संसद देती है। इसके लिए राज्य सरकार तुरंत एक संकल्प पत्र केन्द्र सरकार को भेजे।
3. राज्य में उन सभी पदों में स्थानीय भाषाओं की अनिवार्यता लागू की जाए जाे सीधे जनता से जुड़े हैं जैसे पटवारी, ग्राम पंचायत अधिकारी, स्वास्थ विभाग के कर्मचारी आदि।
बताया कि दूसरा मुद्दा उत्तराखंड में ठोस ‘भू-कानून’ का है राज्य में लचर भू-कानूनों के चलते लगातार हमारी कृषि योग्य भूमि कम होती जा रही है। एक अनुमान के अनुसार हमारे पास कृषि याेग्य भूमि मात्र चार प्रतिशत रह गई है। जनविरोधी भूमि और जंगलात कनूनों ने लोगों को पहाड़ छोड़ने को मजबूर किया है।
इसके लिए जरूरी है कि उत्तराखंड में ऐसा सशक्त ‘भू-कानून’ आये जो हमारी कृषि की खेती काे बचाये और हमारी परंपरागत कृषि, बागवानी, पशुपालन और वन आधारित अर्थव्यवस्था को पुनस्र्थापित करे। अतः हम मांग करते हैं-
1. उत्तराखंड में जमीनों की आखिरी पैमाइश 1964 में हुई थी। जबकि अंग्रेजों ने हमारे यहां 11 बार पैमाइश कराई थी। राज्य बनने के बाद 2004 में यह पैमाइश हो जानी चाहिए थी, लेकिन राज्य बनने के इन 23 सालों बाद भी हमें जमीनों के सटीक आंकड़े पता नहीं हैं।
हम मांग करते हैं कि उत्तराखंड की पूरी जमीन की बड़ी पैमाइश कराकर वन विभाग और सरकारी खाते में चली गई हमारी जमीनों काे मुक्त कराकर उसे कृषि भूमि में शामिल किया जाये।
2. उत्तराखंड में बड़ी संख्या भूमिहीनों की है।
हमारे दलित भाइयों के पास नाममात्र की जमीन भी नहीं है, इसलिए जमीनों की पैमाइश के बाद जमीनों का बंटवारा सुनिश्चित किया जाये।
3. उत्तराखंड में 1960 में ‘कुमाऊं उत्तराखंड जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार कानून’ (कूजा एक्ट)आया तो इसने खेती के विस्तार के सारे रास्ते रोक दिये। इसके तहत विकास कार्यों के लिए नाप जमीन की अनिवार्यता काे समाप्त कर विकास कार्यो के लिए सरकारी जमीन के उपयोग का कानून लागू किया जाये।
4. सरकारों ने समय-समय पर ‘उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार कानून-1950’ में जो भी संशोधन किए गये हैं उन पर पुनर्विचार कर एक ठोस भू-कानून बनाने की दिशा में काम करना चाहिए जो हमारी कृषि योग्य जमीनों को बचाने, किसानों की जमीन का रकवा बढ़ाने और जमीनाें की खरीद-फरोख्त पर रोक सुनिश्चित करे।
5. सरकार ने 6 दिसंबर, 2018 को ‘उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 (अनुकलन एवं उपरांतरण आदेश 2001) (संशाेधन) अध्यादेश-2018’ की धारा-154 में धारा 154 (4) (3) (क) में बदलाव कर दिया गया। नये संशोधन में धारा 154 में उपधारा (2) जोड़ दी गई है। अब इसके लिये कृषक होने की बाध्यता समाप्त कर दी गई है। इसके साथ ही 12.5 एकड़ की बाध्यता को भी समाप्त कर दिया गया।
इतना ही नहीं नये संशोधन में अधिनियम की धारा-143 के प्रावधान को भी समाप्त कर दिया गया। इस संशोधन के माध्यम से इस धारा को 143 (क) में परिवर्तित कर दिया गया। अब अपने उद्योग के लिये प्रस्ताव सरकार से पास कराना है। इसके लिये खरीदी गई कृषि जमीन का भू-उपयोग बदलने की भी जरूरत नहीं है। इसे बहुत आसानी से अकृषक जमीन मान लिया जायेगा। हम मांग करते हैं कि सरकार द्वारा लाये गये इन संशोधनों को तुरंत रद्द किया जाये।
6. हम मांग करते हैं कि अन्य पर्वतीय राज्यों की तरह उत्तराखंड में जमीन खरीदने-बेचने का सख्त कानून आये जो हमारी जमीनाें को बचा सके।
कहा कि हमें उम्मीद है कि आप हमारी भावनाओं को समझते हुए उत्तराखंड में ‘मूल निवास’ और ‘सशक्त भू-कानून’ से उपजे असंतोष को लोकतांत्रिक मांग मानते हुए अपने स्तर पर यथाशीघ्र सुलझाने और हमारे शहीदों के बेहतर राज्य की कल्पना काे मूर्त रूप देने की नीतियां बनायेंगे।
ज्ञापन देने वालों में समन्वय समिति के देवेंद्र नौटियाल ज्योति प्रसाद भट्ट कांग्रेस के जिलाध्यक्ष राकेश राणा वरिष्ठ नेता विजय गुनसोला ,शांति प्रसाद भट्ट ,नरेंद्र चंद्र रमोला, साहब सिंह सजवान ,गंगा भगत सिंह नेगी ज्योति प्रसाद डोभाल, विजयपाल सिंह रावत, श्यामलाल शाह, पुरुषोत्तम दत्त पंत,सतीश चमोली, नागरिक मंच महामंत्री जगजीत सिंह नेगी आदि लोग उपस्थित थे।



