शीशराम बडोनी
घर की संपत्ति में अधिकार और बराबरी देने की बात तो तब हो जब एकल महिलाओं को परिवार के लोग इंसान समझें, उन्हें तो भार समझा जाता है, ज्यादातर परिवार वालों को लगता है जिस महिला का पता उसके पति से न शुरू हो, वह धरती पर रहे ही क्यों…
वैसे तो महिलाओं के प्रति सबसे कम अपराध वाले राज्यों में शुमार है उत्तराखंड परन्तु सामाजिक रूतबे के हिसाब से उत्तराखण्ड की महिलाएं वहां की आर्थिकी की रीढ़ हैं, बावजूद इसके पुरुष प्रधान की मानसिकता और पुरानी रूढ़िवादिता यहां के समाज में भी कूट-कूटकर वैसी ही भरी हैं, जैसी की हमारे देश मे है इस पहाडी प्रदेश का पूरा समाज, घर, परिवार, खेती-बाड़ी, मजदूरी, बच्चों व बूढों की देखभाल सभी महिलाओं की श्रमशक्ति पर टिका हुआ है परन्तु पितृसत्ता की बेड़ियों में बुरी तरह जकड़े इस समाज में भी सामाजिक व सांस्कृतिक परिवेश में महिलाओं को दोयम दर्जा ही हासिल है, बावजूद इसके कि पूरी आर्थिकी उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है। आम महिलाओं की जिंदगी से भी बहुत बुरा हाल है उन महिलाओं का जो अकेली रहकर संघर्ष कर रही हैं। इनमें विधवा, पति के द्वारा छोडी गई(तलाकशुदा) और शादी न करने वाली महिलायें शामिल हैं,
या जिनके पति लापता हैं। परन्तु चुनि हुई सरकरो ने बेटियां बचाने और महिला सशक्तीकरण के तमाम दावे-वादे तो करती सरकारों है परन्तु संविधान में एकल महिलाओं के लिए ऐसा कोई प्रावधान शामिल है या नही जो उन्हें सामाजिक सुरक्षा का आश्वासन ही दे दे इसका समाजिक प्रसार नगण्न्य ही है ।
आज जब देश में बेटी पढाओ, बेटी बचाओ अभियान तो चलाया जा रहा हैं, परन्तु एकल महिलाओं को लोग इंसान तक नहीं समझते। न पिता सम्पत्ति में अधिकार देना चाहते हैं, न ही पति की प्रॉपर्टी में ही अधिकार मिलता है।
समाजिक जन चेतना का ही अभाव कहिये या पुरूष प्रधानता का नजरिया है कि एकल महिलाओं को लोग बहुत बुरी नजर से देखते हैं। गन्दी-गन्दी गालियां या जहाँ दिखे ताने मारना शुरू कर देते है । समाज में लोगों का नजरिया एकल महिलाओं के प्रति बहुत ही नकारात्मक है।
लोगों का सबसे पहला सवाल यही होता है आप शादीशुदा हैं। शादी क्यों नहीं की। हमारे भारतीय समाज की कुंठित मानसिकता है कि पति है तभी किसी का परिवार है नहीं तो हम परिवार का हिस्सा हैं ही नहीं जहॉ तक मै बडे तौर पर समझ पया हूँ कहीं न कहीं एकल महिलाओं के साथ सेक्सुअल उत्पीडन भी ज्यादा होता है। समाज का ढांचा ही ऐसा है कि लोग सिर्फ औरत को शरीर और कमेक्षा के तौर पर देखते हैं, जबकि एकल महिलाएं ज्यादा सशक्त हैं।
पुरुष वर्चस्ववादी समाज में संघर्ष कर रहीं हैं ये एकल महिलायें घर की संपत्ति में अधिकार और बराबरी देने की बात तो तब हो जब एकल महिलाओं को परिवार के लोग इंसान समझें, उन्हें तो भारत समझा जाता है, ज्यादातर परिवार वालों को लगता है जिस महिला का पता उसके पति से न शुरू हो, वह धरती पर रहे ही क्यों…
पुरूष प्रधान समाज में अकेली महिलाओं के प्रति लोगों की सोच बिलकुल अच्छी नहीं है। पुरुष को ही घर का मालिक समझा जाता है। घर, परिवार, समाज और कार्यस्थल पर उनका जबरदस्त यौनशोषण होता है, जिसके लिए वो आवाज तक नहीं उठा पातीं। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के श्रम का बहुत शोषण होता है।
आज हमे एकल महिलाओ को अर्थिक रूप से ससक्त करने से अधिक उनके प्रति बने नजरिया को बदलने की आवश्यकता है ।
समाजिक चेतना की आवश्यकता है । ताकि वह मानसिक रूप से ससक्त हो सके ।





