रिपोर्ट :: सत्य प्रकाश डोडियाल
मानव अपने जीवन काल में वंश वृद्धि की आशा के साथ अपने पूर्वजों को याद करने के लिए उसके जीवन में जो कुछ सुख दुख और पुण्य अर्जित किया उसे उसके वंशज पुत्र पुत्रियां अपने पितरों को श्राद्ध के रूप में समर्पित करते हैं । आज पितृपक्ष का अंतिम श्राद्ध जिसे उत्तराखंड या गढ़वाल क्षेत्र में सर्व श्राद्ध य पितृ विसर्जन कहा जाता है।
आज आश्विन माह की कृष्ण अमावस्या को सर्व पितृ अमावस्या कहते हैं।यह अमावस्या इस बार 6 अक्टूबर यानी बुधवार को है। इस दिन पितृ पक्ष का समापन होगा इसे विसर्जनी अमावस्या भी कहते हैं। इसी दिन पितरों का श्राद्ध करके पितृ ऋण को उतारा जा सकता है। अगर किसी को अपने पितर की पुण्य तिथि याद नहीं है तो वह सर्व श्राद्ध ,सर्व पितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध कर्म कर सकता है। इस बार अमावस्या पर गजछाया नामक योग भी बन रहा है। इस शुभ योग में श्राद्ध करने से घर में सुख-शांति बनी रहती है।
मान्यता है कि इस शुभ योग में अगर कोई व्यक्ति नदी, तालाब या कुंड में स्नान करके पीपल के पेड़ के नीचे हाथी की छाया में श्राद्ध कर्म करता है तो वह सात पीढ़ियों तक पितरों का उद्धारक बन जाता है।
ऐसा व्यक्ति सीधे स्वर्ग का अधिकारी बनता है। आज ही के दिन पृथ्वी लोक से विदा होते हैं पितर आश्विन माह की कृष्ण अमावस्या को श्राद्ध का अंतिम दिन होता है। इस अमावस्या को सर्व पितृ अमावस्या, पितृ अमावस्या अथवा महालय अमावस्या सर्व श्राद्ध भी कहते हैं। सर्वपितृ अमावस्या के दिन पितरों का श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है। इस दिन पितृ पृथ्वी लोक से विदा लेते हैं, इसलिए इस दिन पितरों का स्मरण करके जल अवश्य देना चाहिए। जिन पितरों की पुण्य तिथि की जानकारी न हो, उन सभी पितरों का श्राद्ध सर्व पितृ अमावस्या को करना चाहिए। श्राद्ध संपन्न होने के बाद कन्याओं और ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। इससे पितृगण प्रसन्न होते हैं और अपने परिवार को आशीर्वाद प्रदान करते हैं और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

