गिरीश शर्मा
प्रतापनगर : उत्तराखंड में 2022 के विधानसभा चुनाव को लेकर कयासों का दौर लगाए जाने लगा है यह तो मतदाता ही तय करेगा कि सत्ता परिवर्तन होगा या सरकार की वापसी होगी.
70 विधानसभाओं वाले उत्तराखंड प्रदेश में झील के उस पार कालापानी कहे जाने वाले प्रतापनगर विधानसभा की गिनती आज भी उस विधानसभा में होती है जो विकास की दौड़ में चुनाव दर चुनाव पिछड़ती जा रही है.
इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह नजर आता है कि विधानसभा चुनाव जीतने के बाद विधायक विधानसभा में विकास कार्यों, जनता की समस्याओं की सुध लेने वाला कोई नहीं होता. विधायक और पूर्व विधायक सिर्फ शादी, मुंडन समारोह, क्रिकेट मैच उद्घाटन में ही दिखते हैं.
देखा जाए तो प्रताप नगर विधानसभा में उसी पार्टी का विधायक रहा जिस पार्टी की राज्य में सरकार आई है फिर भी चुने गए विधायक कभी विकास की योजनाओं को झील पार नहीं करवा पाए हैं.
ऐसा लगता है कोरी घोषणाये करना और सड़के बिछाना, डामरीकरण करना ही यहां के विधायकों के लिए विकास मात्र है.
वह यह भूल जाते हैं कि उनकी बिछाई इन सड़कों से लोग वापस नहीं आ रहे हैं बल्कि पलायन करके ऋषिकेश देहरादून की ओर जा रहे हैं. प्रतापनगर विधानसभा में ऐसा लगता है जैसे एक बार हम एक बार तुम कुर्सी पर और एक बार सत्ता हमारी और एक बार तुम्हारी का दस्तूर एक संयोग नहीं साझेदारी है
वर्तमान विधायक विजय पवार को बीएसपी से एमएलसी का चुनाव लड़वाना हो या उस दौर में विक्रम नेगी को ब्लॉक प्रमुख बनवाने के लिए क्षेत्र पंचायत सदस्यों की व्यवस्था करना हो दोनों ने एक दूसरे का साथ दिया.
वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में तमाम शक्ति प्रदर्शन के बाद भी दोनों में से किसी एक को कांग्रेस से टिकट नहीं मिला तो इन्होंने योजनाबद्ध तरीके से पट्टीवाद का खेल खेलकर चारपाई चुनाव चिन्ह पर विजय पंवार को विधायक का चुनाव लड़वाया.
विजय पवार व विक्रम नेगी दोनों के गांव टिहरी बांध परियोजना के डूब क्षेत्र में थे.
स्पष्ट तौर पर कहा जाए तो दोनों के दोनों टिहरी बांध विस्थापित थे और जब तक टिहरी डूबा नहीं था तब तक विस्थापन और बेहतर मुआवजे की लड़ाई लड़ते रहे और जब टिहरी डूब गया तब इन्होंने प्रतापनगर क्षेत्र में अपनी राजनीतिक जमीन तलाशनी शुरू कर दी.
वह प्रतापनगर जो टिहरी डूबने से पहले तक दूसरे क्षेत्रों की तुलना में सुगम था और टिहरी के निकट होने के कारण शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा कुछ किलोमीटर के दायरे में ही मौजूद थी.
टिहरी बांध की अंतिम सुरंग बंद होने के साथ ही यह क्षेत्र काला पानी में तब्दील हो गया जब पुल और रास्ते डूबे तो लोगों में भयंकर रोष था इन दोनों नेताओं ने लोगों के रोष को अपनी राजनैतिक सीढ़ी बनाया और लोगों को दिखाया कि हमने टिहरी मे बेहतर पुनर्वास की लड़ाई लड़ी. अब हम तुम्हारी लड़ाई लड़ेंगे. प्रतापनगर की भोली जनता इनसे यह पूछना भूल गई कि जब हमारे संसाधनों को छीनने की योजना बन रहीं थी, हमारे पुलो और रास्तों को डुबोया जा रहा था तब तुमने हमारी आवाज क्यों नहीं उठाई.
जनता तो तब भी ठगी गई थी और आज भी ठगी जा रही है लेकिन यह दोनों दोस्त प्रतापनगर में अपनी राजनीतिक जड़े मजबूत करने में कामयाब हुए हैं. 2012 में विजय पंवार भाजपा और विक्रम नेगी कांग्रेस के टिकट से आमने-सामने थे बाजी इस बार विक्रम नेगी ने मारी.
वर्ष 2012 से वर्ष 2017 में विक्रम नेगी के कार्यकाल में विजय पंवार बिपक्ष के रूप मे पांच साल तक कहीं नजर नही आये और ना ही किसी ने उन्हें विक्रम नेगी के खिलाफ एक शब्द तक बोलते सुना.
यह दोनों राजेश्वर पैन्यूली ने बिपक्ष की भूमिका को बेहतर तरीके से निभाते हुए डोबरा चांटी पुल को मुख्य मुद्दा बनाया और हर स्तर पर इसे जोर-शोर से उठाया. राजेश्वर पैन्यूली की सक्रियता को देखते हुए मजबूरन विजय पंवार को 2016 में सोमेश्वर महादेव मंदिर पर धरने पर बैठने का दिखावा करना पड़ा लेकिन यहां पर भी कभी उन्होंने विक्रम नेगी के खिलाफ आवाज तक नहीं उठाई और ना ही कभी एक भी शब्द पुल पर हुए भ्रष्टाचार पर कहा.
विक्रम नेगी के मुंह से भी विजय पंवार के खिलाफ शायद ही कुछ सुनाई दिया हो.
विक्रम नेगी तो उनसे सवाल पूछने वाली जनता को ही कोसते नजर आये.
कार्यक्रमों में राजेश्वर पैन्यूली के खिलाफ बोलना और पुराने कांग्रेसी साथियों को सुनाना इनकी आदत है लेकिन कभी खुलकर विजय पंवार के खिलाफ बोलते नहीं सुना गया. वर्ष 2022 विधानसभा चुनाव की बात करें तो राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि प्रतापनगर विधानसभा में भाजपा चुनाव में चेहरा बदल सकती है जिसके लिए संघ के करीबी भान सिंह नेगी, पूर्व दायित्वधारी रोशनलाल सेमवाल, पूर्व ब्लाक प्रमुख प्रेम दत्त जुयाल, अतर सिंह तोमर, वर्तमान जिला पंचायत अध्यक्ष सोना सजवाण के नाम सामने आ रहे हैं साथ ही वर्तमान जिला अध्यक्ष ने तो मां की कसम खाकर बड़ी जनसभा में वर्तमान ब्लाक प्रमुख प्रदीप रमोला को टिकट दिए जाने की बात कही है.
अपना टिकट पक्का मान रहे विक्रम नेगी की राह भी इतनी आसान नहीं है.
2017 में वह पूरे 5 साल क्षेत्र से नदारद रहे. ओबीसी को अपना मास्टर स्ट्रोक मानने वाले विक्रम नेगी तब भी ओवर कॉन्फिडेंट में थे लेकिन ओणेश्वर महादेव मंदिर में केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह की घोषणा ने उनके समीकरण बिगाड़ दिए.
एक बार चुनाव में अपनी किस्मत आजमा चुके देवी सिंह पवार भी कांग्रेस से टिकट की दावेदारी कर रहे हैं वहीं सीए राजेश्वर पैन्यूली कई सालों से प्रतापनगर क्षेत्र में लोगों की समस्याओं पर काम कर रहे हैं.
केंद्रीय विद्यालय को इस क्षेत्र में स्थापित करवाने से लेकर डोबरा चांठी पुल के लिए संघर्ष और कई जन सरोकार के काम को करने वाले राजेश्वर पैन्यूली इस बार मजबूत दावेदार है.
देखने वाली बात यह होगी कि कई जन सरोकार के काम करने वाले राजेश्वर पैन्यूली मुख्य पार्टियों में टिकट बंटवारे की योग्यता पर फिट बैठते हैं कि नहीं? क्या प्रताप नगर की जनता इस बार कुछ नया चुनती है या फिर दोस्तों को बारी-बारी कुर्सी सौपेगी. यह आने वाला वक्त ही बता पाएगा.




